तुम मुझको कब तक रोकोगे !
मैं उस माटी का पेड़ नहीं
जिसको नदियों ने सींचा है
बंजर माटी में पलकर
मैंने मौत से जीवन छीना है
मैं पत्थर पर लिखी इबारत हूँ
मैं पत्थर पर लिखी इबारत हूँ
शीशे से कब तक तोड़ोगे
मिटने वाला मैं नाम नहीं
तुम मुझको कब तक रोकोगे !
तुम मुझको कब तक रोकोगे !

